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कुंवारी बेटियों को भी माता-पिता से गुजारा भत्ता पाने का अधिकार: उच्च न्यायालय

याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई थी कि निचली अदालत इस तथ्य पर विचार करने में विफल रही है कि इन बेटियों के पिता वृद्ध और अशक्त व्यक्ति हैं, जिनके पास आय का कोई स्रोत नहीं है और वह पहले से ही अपनी बेटियों का लालन-पालन करते आ रहे हैं तथा घरेलू हिंसा कानून के तहत गुजारा भत्ता के लिए आवेदन उनके चचेरे भाई की तरफ से कराया गया है। याचिकाकर्ता ने अपनी दलील में कहा कि उनकी पत्नी की मृत्यु के बाद से उनकी बेटियां उनके साथ रह रही हैं और उनका खर्च भी वह स्वयं वहन कर रहे हैं। याचिकाकर्ता ने कहा कि उनकी बेटियां शिक्षित हैं और ट्यूशन पढ़ाकर आय अर्जित कर रही हैं। उन्होंने सबसे प्रमुख दलील यह दी कि उनकी बेटियां बालिग हैं और इसलिए वे किसी तरह के गुजारा भत्ते का दावा नहीं कर सकतीं।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने व्यवस्था दी है कि कुंवारी बेटियों को, धर्म और उम्र के निरपेक्ष, घरेलू हिंसा कानून के तहत अपने माता-पिता से गुजारा भत्ता हासिल करने का अधिकार है। न्यायमूर्ति ज्योत्स्ना शर्मा ने नईमुल्लाह शेख और एक अन्य व्यक्ति की याचिका खारिज करते हुए कहा कि इस बात में कोई संदेह नहीं है कि अविवाहित बेटियां, चाहे वे हिंदू हों या मुस्लिम अथवा उनकी उम्र चाहे जो हो, गुजारा भत्ता हासिल करने की हकदार हैं। अदालत ने कहा कि हालांकि जब मुद्दा केवल गुजारा भत्ता से जुड़ा न हो तो पीड़ित व्यक्ति को घरेलू हिंसा कानून की धारा 20 के तहत स्वतंत्र अधिकार उपलब्ध हैं। मौजूदा मामले में एक पिता ने अपनी अविवाहित बेटियों को गुजारा भत्ता दिये जाने के निचली अदालत के आदेश को चुनौती दी थी।

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