विद्यालयों में कौशल शिक्षा को अनिवार्य बनाना: आत्मनिर्भर भारत की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम

डॉ. विनय स्वरूप मेहरोत्रा
प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष, कृषि एवं पशुपालन विभाग एवं पाठ्यक्रम विकास एवं मूल्यांकन केंद्, पीएसएस केंद्रीय व्यावसायिक शिक्षा संस्थान (राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद की एक घटक इकाई, शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार के अधीन), भोपाल
प्रतिवर्ष 15 जुलाई को विश्व युवा कौशल दिवस मनाया जाता है। वर्ष 2026 में भी हम इसे “साझा भविष्य के लिए कौशल” विषय-वस्तु के साथ मना रहे हैं। इस लेख में हम इस बात पर चर्चा करेंगे कि “कौशल शिक्षा” को हमारे विद्यालयी शिक्षा तंत्र का अभिन्न अंग बनाना क्यों आवश्यक है तथा विद्यालयों में कौशल शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए अब तक कौन-कौन-सी पहलें की गई हैं।
शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य केवल ज्ञान अर्जित करना नहीं, बल्कि “जीवन” के लिए तैयार करना है। आज जब विश्व तेजी से बदल रहा है और रोजगार के स्वरूप निरंतर परिवर्तित हो रहे हैं, तब केवल सैद्धांतिक शिक्षा विद्यार्थियों की आवश्यकताओं को पूरा नहीं कर सकती। आधुनिक समाज को ऐसे युवाओं की आवश्यकता है जो ज्ञान के साथ-साथ व्यावहारिक कौशल, नवाचार, समस्या-समाधान क्षमता, डिजिटल दक्षता और उद्यमशीलता से भी युक्त हों। यही कारण है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 ने विद्यालयी शिक्षा में कौशल शिक्षा को एक अनिवार्य और अभिन्न अंग के रूप में शामिल करने पर विशेष बल दिया है।
भारत विश्व की सबसे युवा आबादी वाले देशों में से एक है। यदि इस विशाल युवा शक्ति को समयानुकूल कौशल प्रदान किया जाए तो यह देश की आर्थिक, सामाजिक और तकनीकी प्रगति का सबसे बड़ा आधार बन सकती है। इसके विपरीत यदि शिक्षा केवल परीक्षा और प्रमाण-पत्र तक सीमित रह जाए तो बेरोजगारी और कौशल-अंतर (Skill Gap) जैसी समस्याएँ बढ़ती जाएँगी। इसलिए विद्यालय स्तर से ही विद्यार्थियों को कौशल आधारित शिक्षा उपलब्ध कराना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
विद्यालयी शिक्षा में कक्षाएँ 6 से 8 की एनसीईआरटी द्वारा प्रकाशित “कौशल बोध” गतिविधि पुस्तिकाएँ की अवधारणा विद्यार्थियों को विभिन्न व्यवसायों, उद्योगों और कार्यक्षेत्रों से परिचित कराने का महत्वपूर्ण माध्यम है। कौशल बोध का उद्देश्य किसी एक व्यवसाय में विशेषज्ञ बनाना नहीं, बल्कि विद्यार्थियों में कार्य के प्रति सम्मान, श्रम की गरिमा, उद्यमशील सोच तथा करियर के विविध विकल्पों के प्रति जागरूकता विकसित करना है। जब विद्यार्थी प्रारम्भिक कक्षाओं से ही यह समझने लगते हैं कि समाज में प्रत्येक कार्य का अपना महत्व है, तब उनमें श्रम के प्रति सम्मान और आत्मनिर्भर बनने की प्रेरणा विकसित होती है।
कौशल बोध के अंतर्गत विद्यार्थियों को स्थानीय संसाधनों, पारंपरिक हस्तशिल्प, कृषि, लघु उद्योगों, डिजिटल तकनीक, पर्यावरण संरक्षण तथा सामुदायिक सेवाओं से परिचित कराया जाता है। वे केवल पुस्तकों में पढ़ते ही नहीं, बल्कि देखकर, समझकर और स्वयं करके सीखते हैं। इससे उनकी जिज्ञासा, रचनात्मकता, सहयोग की भावना तथा व्यावहारिक सोच का विकास होता है। यही अनुभव भविष्य में सही करियर चयन का आधार बनते हैं।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 की एक अत्यंत अभिनव पहल बैगलेस दिवस (Bagless Days) है। इन दिनों विद्यार्थी बिना बस्ते के विद्यालय आते हैं और विद्यालय के बाहर वास्तविक कार्यस्थलों पर सीखने का अवसर प्राप्त करते हैं। वे स्थानीय कारीगरों, किसानों, बैंकों, अस्पतालों, उद्योगों, सेवा संस्थानों, विज्ञान केंद्रों तथा विभिन्न व्यावसायिक प्रतिष्ठानों का भ्रमण करते हैं। वे बढ़ईगीरी, बागवानी, मिट्टी कला, सिलाई, विद्युत कार्य, खाद्य प्रसंस्करण, कंप्यूटर अनुप्रयोग, डिजिटल सेवाओं तथा अन्य स्थानीय व्यवसायों को प्रत्यक्ष रूप से देखते और समझते हैं।
बैगलेस दिवस का सबसे बड़ा लाभ यह है कि शिक्षा कक्षा की चारदीवारी से बाहर निकलकर जीवन से जुड़ जाती है। विद्यार्थी अनुभव के माध्यम से सीखते हैं कि किसी भी कार्य को सफल बनाने के लिए अनुशासन, समय प्रबंधन, टीमवर्क, गुणवत्ता, सुरक्षा तथा ग्राहक संतुष्टि कितनी महत्वपूर्ण होती है। यह अनुभव उनके आत्मविश्वास को बढ़ाता है और उन्हें वास्तविक जीवन की चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार करता है। साथ ही, वे समाज में कार्यरत विभिन्न पेशेवरों के योगदान को समझते हैं और प्रत्येक कार्य के प्रति सम्मान का भाव विकसित करते हैं।
विद्यालयी शिक्षा में कक्षाएँ 9 से 12 में व्यावसायिक शिक्षा का समावेश कौशल विकास की दिशा में एक और महत्वपूर्ण कदम है। व्यावसायिक शिक्षा विद्यार्थियों को विभिन्न जॉब रोल्स के अनुरूप व्यवस्थित प्रशिक्षण प्रदान करती है। यह प्रशिक्षण केवल सैद्धांतिक नहीं होता, बल्कि व्यावहारिक गतिविधियों, प्रयोगशाला कार्य, परियोजनाओं, इंटर्नशिप तथा उद्योगों के सहयोग से संचालित होता है। इससे विद्यार्थी कार्यस्थल की वास्तविक आवश्यकताओं को समझते हैं और रोजगार के लिए तैयार होते हैं।
आज विद्यालयों में सूचना प्रौद्योगिकी, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence), कृषि, स्वास्थ्य सेवा, पर्यटन एवं आतिथ्य, रिटेल, बैंकिंग एवं वित्तीय सेवाएँ, ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स, मीडिया एवं मनोरंजन, फैशन डिज़ाइन, ब्यूटी एवं वेलनेस, खाद्य प्रसंस्करण, नवीकरणीय ऊर्जा तथा उद्यमिता जैसे अनेक क्षेत्रों में जॉब रोल आधारित पाठ्यक्रम संचालित किए जा रहे हैं। इन पाठ्यक्रमों का निर्माण राष्ट्रीय कौशल योग्यता ढाँचे (National Skill Qualifications Framework) के अनुरूप किया गया है ताकि विद्यार्थियों को उद्योगों की आवश्यकताओं के अनुसार दक्ष बनाया जा सके।
कौशल शिक्षा का उद्देश्य केवल नौकरी प्राप्त करना नहीं है, बल्कि विद्यार्थियों को रोजगार योग्य और स्वरोजगार योग्य बनाना भी है। आज अनेक युवा छोटे-छोटे स्टार्टअप, ऑनलाइन व्यवसाय, डिजिटल सेवाएँ, कृषि आधारित उद्यम तथा स्थानीय उद्योगों के माध्यम से सफल उद्यमी बन रहे हैं। यदि विद्यालय स्तर से ही विद्यार्थियों में उद्यमशीलता, वित्तीय साक्षरता, नवाचार तथा नेतृत्व क्षमता विकसित की जाए तो वे भविष्य में स्वयं रोजगार सृजित करने वाले नागरिक बन सकते हैं।
कौशल शिक्षा विद्यार्थियों में अनेक जीवनोपयोगी कौशलों का भी विकास करती है। इनमें संचार कौशल, टीमवर्क, नेतृत्व क्षमता, समय प्रबंधन, समस्या-समाधान, निर्णय लेने की क्षमता, रचनात्मक सोच, डिजिटल साक्षरता, नैतिक मूल्य तथा पर्यावरण के प्रति उत्तरदायित्व प्रमुख हैं। यही कौशल इक्कीसवीं सदी के नागरिक की पहचान हैं और वैश्विक प्रतिस्पर्धा में सफलता का आधार भी।
शिक्षकों, अभिभावकों, उद्योगों तथा स्थानीय समुदाय की सक्रिय भागीदारी कौशल शिक्षा को प्रभावी बनाने में अत्यंत महत्वपूर्ण है। विद्यालयों को स्थानीय उद्योगों, औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों (ITI), पॉलीटेक्निक, कौशल विकास केंद्रों तथा उद्यमियों के साथ सहयोग स्थापित करना चाहिए ताकि विद्यार्थियों को वास्तविक कार्यस्थलों का अनुभव मिल सके। इसी प्रकार अभिभावकों को भी यह समझना होगा कि कौशल शिक्षा पारंपरिक शिक्षा का विकल्प नहीं, बल्कि उसका सशक्त पूरक है।
आज भारत आत्मनिर्भर भारत, मेक इन इंडिया, डिजिटल इंडिया, स्टार्टअप इंडिया तथा स्किल इंडिया मिशन जैसी महत्वाकांक्षी पहलों के माध्यम से विश्व की अग्रणी अर्थव्यवस्था बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। इन सभी अभियानों की सफलता ऐसे युवाओं पर निर्भर करती है जो ज्ञान और कौशल दोनों से समृद्ध हों। विद्यालयी शिक्षा में कौशल शिक्षा का समावेश इन राष्ट्रीय लक्ष्यों की प्राप्ति का आधार बन सकता है।
अंततः यह कहा जा सकता है कि कौशल शिक्षा केवल एक अतिरिक्त विषय नहीं, बल्कि आधुनिक शिक्षा की अनिवार्य आवश्यकता है। कौशल बोध विद्यार्थियों में कार्य संस्कृति और करियर जागरूकता विकसित करता है, बैगलेस दिवस उन्हें अनुभवात्मक अधिगम का अवसर प्रदान करते हैं और जॉब रोल आधारित व्यावसायिक शिक्षा उन्हें उद्योगों की आवश्यकताओं के अनुरूप दक्ष बनाती है। इन तीनों का समन्वय शिक्षा को अधिक व्यवहारिक, समावेशी, रोजगारोन्मुख और जीवनोपयोगी बनाता है। जब प्रत्येक विद्यार्थी ज्ञान के साथ कौशल, नवाचार, आत्मविश्वास और उद्यमशीलता से युक्त होगा, तभी भारत वास्तव में आत्मनिर्भर, समृद्ध और विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में सशक्त कदम बढ़ा सकेगा।


