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सभी मोबाइल फोन में प्री-इंस्टॉल करने के सरकारी निर्देश पर विवाद

केंद्र सरकार के संचार साथी ऐप को सभी मोबाइल फोनों में प्री-इंस्टॉल करने के निर्देश पर मंगलवार को बड़ा राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है। विपक्ष ने इसे असंवैधानिक, निगरानी का औज़ार और “बिग ब्रदर” की नीति करार दिया, जबकि सरकार ने दोपहर में स्पष्टीकरण जारी करते हुए साफ किया कि ऐप इंस्टॉल करना या सक्रिय करना बिल्कुल अनिवार्य नहीं है और उपभोक्ता चाहें तो इसे कभी भी डिलीट कर सकते हैं।

बता दें कि दूरसंचार विभाग ने 28 नवंबर को आदेश जारी किया था कि सभी नए स्मार्टफोनों में संचार साथी ऐप पहले से मौजूद होना चाहिए और जिन डिवाइसेज़ में यह ऐप नहीं है, उनमें इसे सॉफ्टवेयर अपडेट के ज़रिए उपलब्ध कराया जाए। मौजूद जानकारी के अनुसार, यह कदम साइबर धोखाधड़ी रोकने और मोबाइल उपयोगकर्ताओं को सुरक्षित रखने की दिशा में उठाया गया था। इस आदेश का असर एप्पल, सैमसंग, गूगल, शाओमी और वीवो जैसे बड़े निर्माताओं पर पड़ना तय था।

गौरतलब है कि सरकार ने यह भी कहा था कि आदेश का पालन न करने पर दूरसंचार अधिनियम, 2023 और टेलीकॉम साइबर सिक्योरिटी नियम, 2024 के तहत कार्रवाई हो सकती है। निर्देश के तुरंत बाद विपक्ष ने इसे निजता पर हमला बताते हुए तीखी प्रतिक्रिया दी।

प्रियंका गांधी वाड्रा ने इसे “स्नूपिंग ऐप” बताया और कहा कि नागरिकों के पास निजता का अधिकार है। वहीं कांग्रेस नेता केसी वेणुगोपाल ने इसे “बिग ब्रदर मॉडल” कहते हुए दावा किया कि ऐसा ऐप नागरिकों की हर गतिविधि पर नज़र रख सकता है। कई विपक्षी नेताओं ने इसे निगरानी राज्य की ओर बढ़ता कदम बताया।

सरकार ने इन आरोपों को सिरे से खारिज किया है। केंद्रीय संचार मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने स्पष्ट किया कि ऐप पूरी तरह वैकल्पिक है, उपभोक्ता चाहें तो इसका उपयोग न करें और हटाकर भी सकते हैं। मंत्री ने कहा कि संचार साथी ऐप ने 2024 में करीब 22,800 करोड़ रुपये की साइबर धोखाधड़ी रोकने में मदद की है और यह नागरिकों को उनके मोबाइल कनेक्शन सुरक्षित रखने में सक्षम बनाता है।

सरकार के मुताबिक, इस ऐप से IMEI सत्यापन, चोरी हुए फोन की शिकायत और उपभोक्ता के नाम पर जारी मोबाइल कनेक्शनों की जानकारी मिलती है। अब तक 1.5 करोड़ से ज्यादा लोग ऐप डाउनलोड कर चुके हैं और इस प्रणाली की मदद से लगभग 20 लाख चोरी हुए उपकरणों को ट्रैक किया जा चुका है, जिनमें से 7.5 लाख फोन वापस अपने मालिकों को सौंपे जा चुके हैं।

इधर बीजेपी ने भी इसे निगरानी का औज़ार बताने के आरोपों को गलत कहा है। पार्टी प्रवक्ता संबित पात्रा ने दावा किया कि ऐप उपभोक्ता के संदेश, कॉल या व्यक्तिगत डेटा तक किसी भी तरह की पहुंच नहीं रखता है और इसका मकसद सिर्फ सुरक्षा प्रदान करना है।

उधर तकनीकी मोर्चे पर भी हलचल है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, एप्पल इस आदेश का पालन करने के पक्ष में नहीं है और कंपनी सरकार को यह बताने की तैयारी कर रही है कि वह अपने सिस्टम स्ट्रक्चर के कारण किसी भी सरकारी ऐप को अनिवार्य रूप से प्री-लोड नहीं कर सकती है। सैमसंग और गूगल इस आदेश की कानूनी और तकनीकी बारीकियों की जांच कर रहे हैं।

कुल मिलाकर, विवाद अभी शांत होता नहीं दिख रहा है और आने वाले दिनों में सरकार, विपक्ष और मोबाइल कंपनियों के बीच इस मुद्दे पर और बहस जारी रहने की संभावना है।

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