ब्रेकिंग
MP के 25 शहरों में तापमान 10°C से कम: नेशनल हेराल्ड केस में दिल्ली हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, सोनिया-राहुल समेत 7 आरोपियों को जारी किया नोटिस यादव समाज शिक्षित, संगठित और स्वावलंबी समाज है:- किशन सूर्यवंशी, अध्यक्ष नगर निगम, भोपाल मनरेगा खत्म कर नई योजना लाएगी मोदी सरकार; अब 100 की जगह 125 दिन काम की गारंटी; महात्मा गांधी का नाम ... बिहार में बड़ा बदलाव: संजय सरावगी बने भाजपा के नए प्रदेश अध्यक्ष; दिलीप जायसवाल की जगह संभालेंगे कमा... केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह को पाकिस्तान से खतरा:गृह मंत्रालय ने सुरक्षा बढ़ाई; भोपाल-दिल्ली आवास के... मेसी हैदराबाद में थोड़ी देर में फ्रेंडली मैच खेलेंगे:फुटबॉलर कोलकाता स्टेडियम से जल्दी निकले, फैंस ने... विकास और सेवा के दो साल - प्रदेश में दो साल में हुआ अकल्पनीय विकास : मुख्यमंत्री डॉ. यादव रायपुर : मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय ने केंद्रीय गृह मंत्री श्री अमित शाह का स्वामी विवेकानंद वि... मोदी सरकार का बड़ा फैसला: 2027 में होगी देश की पहली डिजिटल जनगणना, कैबिनेट ने 11,718 करोड़ के बजट को...
मुख्य समाचार

क्या था कर्पूरी ठाकुर का ‘आरक्षण दांव’

समस्तीपुर का पितौढियां गांव, क्या था केपी का आरक्षण वाला दांव। दो बार के सीएम लेकिन अपना एक घर तक नहीं। ऐसा मुख्यमंत्री जो करता था रिक्शा की सवारी, लालू और नीतीश के गुरू, जेपी-लोहिया को मानते आदर्श। मंडल कमीशन से पहले बिहार में ओबीसी आरक्षण देने वाले नेता। आज का एमआरआई एक ऐसी शख्सियत पर करेंगे जिन्हें भारत रत्न से नवाजने का ऐलान मोदी सरकारी की तरफ से किया गया है। बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर की 24 जनवरी को 100वीं जयंती है। कर्पूरी जयंती पर राष्ट्रीय जनता दल से लेकर जनता दल यूनाइटेड तक ने अपने-अपने स्तर पर कार्यक्रम आयोजित किए। लेकिन अचानक केंद्र सरकार की तरफ से लिए गए फैसले ने बिहार की सियासत में खलबली मचा दी।

कर्पूरी ठाकुर कौन थे?

बिहार के समस्तीपुर जिले के एक छोटे से गाँव के रहने वाले ठाकुर एक स्वतंत्रता सेनानी थे और 1924 में अंग्रेजों के खिलाफ भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लेने के कारण उन्हें जेल में डाल दिया गया था। उन्होंने कहा था कि हमारे देश की आबादी इतनी अधिक है कि केवल थूक देने से अंग्रेजी राज बह जाएगा। वे अगस्त क्रांति में शामिल हुए। 9 अगस्त 1942 को दरभंगा में छात्रों की बैठक हुई। कर्पूरी ठाकुर ने क्रांतिकारी भाषण दिया। उसका असर ऐसा हुआ कि सरकारी भवनों पर तिरंगा फहराने लगा। रेल की पटरियां उखड़ने लगी। 1945 में कर्पूरी की जेल यात्रा समाप्त हुई। कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के सक्रिय सदस्य बने। नारा दिया- कमाने वाला खाएगा, लूटने वाला जाएगा। नया जमाना आएगा। गांव-गंवा में ये नारा चर्चित हो गया। 1952 में ठाकुर पहली बार विधायक बने और राज्य स्तर पर उनकी चुनाव जीतने की लय 1985 तक जारी रही। ‘जन नायक’ के नाम से जाने जाने वाले कर्पूरी ठाकुर दो बार 1970 में (संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के साथ) ) और 1977 (जनता पार्टी के साथ) बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में कार्य किया। कहा जाता है कि सीएम के रूप में ठाकुर ने हिंदी भाषा को बढ़ावा देने, स्कूल की फीस माफ करने और पंचायती राज व्यवस्था को मजबूत करने के उद्देश्य से कई नीतियां पेश कीं।

फर्स्ट डिवीजन से पास किए हो? मेरा पैर दबाओ

साल 1938 में समस्तीपुर जिले के पितौजिया गांव में एक लड़का मैट्रिक की परीक्षा का परिणाम देखकर घर लौट रहा था।  पिता गोकुल ठाकुर गांव में हजाम थे। पढ़ने के बहुत मौके नहीं थे। बहुत कशमकश के साथ पढ़ाई चल रही थी। लेकिन मैट्रिक के नतीजों में मेहनत का रंग साफ नजर आया। लड़का भागता हुआ पिता के पास पहुंचा और प्रफुल्लता से बोला- बापूजी मैट्रिक में पहले दर्जे से पास हुआ हूं। ये वो दौड़ था जब ग्रामीण इलाकों में मैट्रिक पास खोजे से नहीं मिलते थे। फर्स्ट डिविजन तो बहुत दूर का सपना होता था। लड़के को लेकर पिता गांव के जमींदार के पास खुशखबरी देने के लिए पहुंचे। सोचा कुछ सहारा हो जाएगा। लड़के ने खुश होकर जमींदार को बताया कि मैट्रिक के इम्तिहान में अव्वल दर्जे से पास हुआ हूं। खाट पर लेटे जमींदार ने जवाब दिया पहले दर्जे से पास हुए हो, तू ही पास किया है मैट्रिक, अच्छा ठीक है। उसके बाद सामने एक टेबल रखी थी। जमींदार ने टेबल पर अपना पैर रखते हुए कहा चलो अब गोर (पांव) दबाओ। इस घटना के 32 साल बाद इस लड़के के गोर मुख्यमंत्री की कुर्सी के नीचे टिके थे।

क्या था कर्पूरी ठाकुर का ‘आरक्षण दांव’

जातियों का विभाजन केवल बिहार में नहीं है। हां यहां लकीरें थोड़ी गहरी हैं। लेकिन गांव में अलग-अलग जातियों के हिसाब से वहां पर टोले-मोहल्ले होना एक आम बात है। लेकिन कहते हैं न कि इतिहास ने लकीरें भले ही गहरी कर दी लेकिन वर्तमान में कुछ चीजें बदलती भी हैं। कुछ ऐसी भी जगह होती हैं जहां पर जातियों को छोड़कर सारे लोग एक साथ बैठकर खाते हैं, पीते हैं, बाते करते हैं। बिहार की राजनीति के ज्यादा पन्ने नहीं पलटने होंगे लेकिन ये दिख जाएगा कि दलितों और पिछड़ों के लिए सबसे पहले संवैधानिक जिम्मेदारियां निभाने वाले बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर ने क्या-क्या देखा था? कर्पूरी ठाकुर जनता पार्टी के नेता के तौर पर जून 1977 को बिहार के मुख्यमंत्री बने। उन्होंने मुख्यमंत्री बनते ही पिछड़ों को आरक्षण के वादे को पूरा करने का काम शुरू किया। जिसकी वजह से वो अपनी ही पार्टी के अंदर आलोचना का शिकार होने लगे। यहां तक की जेपी पर भी कर्पूरी ठाकुर से नाराजगी की बात कही गई थी। मुख्यमंत्री बनते ही उनहोंने 27 फीसदी आरक्षण पिछड़ों को दे दिया था। ये उनकी सोच थी। उन्होंने उस गरीबी, परेशानियों और भेदभाव को बहुत करीब से देखा था। मंडल कमीशन तो बहुत बाद में आया लेकिन उससे पहले ही उन्होंने ये करके दिखाया था। उन्होंने ये सोचा था कि कैसे सबको आगे लेकर बढ़ना है। लेकिन ये तमाम कदम नाकाफी ही साबित हुए। ऊंची जातियों के दबाव में उन्हें 27 प्रतिशत से घटाकर आरक्षण 20 प्रतिशत करना पड़ा, फिर भी उनकी सरकार गिरा दी गई। कतार में खड़े अंतिम व्यक्ति का संघर्ष तो समूचे देश में एक समान है। लेकिन सवाल सोच की उस जाति वाले विभाजन पर भी है जहां हर व्यक्ति कि जिज्ञासा ये होती है कि सामने वाली की जाति कौन सी है? बिहार में राजनीतिक पार्टियों का गठन भी जाति देखकर होता है। अपनी जाति के नेता पर विश्वास भी सर्वमान्य है।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Slot Site
Back to top button
Don`t copy text!